Sunday, November 9, 2008

अश्क

खामोश, पर ना
जिन्दा, पर ना
खुशी, पर ना
गम, पर ना
हाँ, पर ना
ना, पर ना
वाह! पर ना
आह! पर ना
जिद, पर ना
सहमति, पर ना
फ़िर, पर ना
अब, पर ना...

हाँ,
जुबां दिल की
हर हरक़त पर
हर आँख में
नूर हो या बेनूर
किसी से नहीं दूर।

Sunday, November 2, 2008

वक्त के फेर में

हम सब जानते हैं
वक्त की कमी को,
खुले दिल से मानते हैं
वक्त की कमी को,
हम मेट्रो सिटी वासी
जितने सुलझे हैं
वाकई,
हम सब,
वक्त के फेर में
उतने ही उलझे हैं।


जब-जब कहा गया उनसे

जब-जब कहा गया उनसे-
ठीक नहीं भाई बिन सोचे-समझे
खेती को खाते जाना
शहरी अन्धानुकरण में
कंक्रीट के जंगल बढाते जाना
सीढीयों को तरसती सीढीनुमा इमारतें
खड़ी करते जाना
नकली घास और पोधों से
प्रकृति का श्रंगार करते जाना
उनकी कड़ी प्रतिक्रिया-
तुम विकास विरोधी हो!

जब-जब कहा गया उनसे-
फैशन के नाम पर जिस्म की नुमाइश ठीक नहीं
स्त्री विमर्श के नाम पर नारी को कमतरी का
अहसास दिलाना बड़ा गुनाह है
आधुनिक होने का झांसा दे
उसके तन, मन और विचारों से खेलना
सीधी-सीधी ठगी है
तो पता है क्या बोले?
तुम स्त्री गुलामी के प्रतीक हो!

जब-जब कहा गया उनसे-
भाई, सेक्स पढाने की चीज़ नहीं
मन्दिर-मस्जिद लड़ने की जगह नहीं
संसद कोई अखाडा नहीं
जनता का पैसा निजी खजाना नहीं
उनकी एक सुर में दहाड़-
तुम लोकतंत्र के दुश्मन!

जब-जब कहा गया उनसे-
सच छुपाने की चीज़ नहीं
जमाना होशियार
पैसे वाले कंगाल कहलाओगे
विकल्प हज़ार
तुम माँ, बेटी, बहन और बीवी को
तरस जाओगे
हमें है ख़ुद से प्यार
तुम पुनः गुलाम बन जाओगे
उनकी पूरी बेशर्मी से हुंकार-
हम हैं तैयार!


Friday, October 31, 2008

टुकड़ों में घरोंदा बंटता जाएगा

हौसला आतंकियों का बढ़ता जाएगा
कारवां बीच रस्ते लुटता जाएगा।

सींचा था जिसको लहू से अपने
अब वो चमन उजड़ता जाएगा।

आँख अपनी खोल लो देशवासियों,
टुकड़ों में घरोंदा बंटता जाएगा।

अपने ही हुए हैं प्यासे खून के,
तसलीम किसको दोष देता जाएगा।

Wednesday, October 15, 2008

दीवाली

जीत की खुशियाँ, खुशी की जीत है।
जुबां-जुबां पर मिलन का गीत है।

हर गली, हर मोड़ पर छाया खुमार
घरों में निभानी कई रीत हैं।

बाज़ार में रौनक, गेहूँ के लिये तैयार खेत,
फिजां में मिट्टी के बर्तनों का संगीत है।

मौसम ने उतार फेंका गर्मी का लिबास
रात ने ठण्ड से लगायी प्रीत है।

मुन्ने की जिद आतिशबाजी के लिए,
गुड्डी ने कहा, कलेंडर ठीक है।

त्यौहार है मिलन, मोहब्बत का
हर तरफ़ रोशन खुशी के दीप हैं।

Friday, October 10, 2008

न...न... रोना न

न... न...रोना न
जीवन अपना खोना न
आंसू बूंद संभाल जरा
इतना अच्छा सोना न।

बेसबब बातों से बच
निकाल जुबां से हरदम सच
मत अपना ही रख कायम
बोझ किसी का ढोना न।

जीना हंसकर रोज, हर पल
लौट के आया है कब कल
एक पहचान बनाकर चल
भीड़ में चलकर खोना न।

रिश्तों से रिश्ते जुड़ जाते
फूलों पर ही भंवरे आते
दोस्त बड़ी पूंजी हैं दोस्त
बीज ईर्ष्या के बोना न।

करने से कुछ भी हो जाता
रीते मन अपना भी जाता
खून-पसीना रंग पहचान
काम में जादू टोना न।

Wednesday, October 8, 2008

बावली

यह तो बावली है
हाँ, यह तो बावली है
औरत है यह?
ना,
यह तो मेरे शरीर का कोई अंग
ना,
यह तो लोहे को लगा जंग
लड़ना खूब जानती है
रोना खूब जानती है
मनाता हूँ तो
मानना खूब जानती है
कहूँ इसको चतुर-चालाक
ना, साया खूब मांगती है
लगता, अब झगडा ख़त्म
आज के बाद सुखी हम
सारी स्त्री दुनिया से दूर
पुरूष वर्चस्व से दूर
खुशहाल होंगे हम
पर ना,
मैं कम क्यों चाहता हूँ उसे ?
बस, इसी बात पर बवाल
क्यों समझाते हो मुझे?
मैं क्यों नहीं समझा सकती तुम्हें?
हर बात पर यही सवाल
बचपन में माँ
बड़े होने पर बहन
बुढापे में बीवी
और
कमजोर होती सांसों में बेटी
हर बार, हर मोड़ पर
गलती पर भी
मेरा कवच बनने को तावली है
यह तो बावली है
हाँ, यह तो बावली है।

Sunday, September 14, 2008

आतंक

आतंक,
बुराई के इरादे हैं मजबूत
उनके निशाने हैं अचूक
उनके हाथ में नहीं बन्दूक
बाज़ार में ग्राहक से ज्यादा नहीं पहचान
पल भर में उनके खाते में दर्जनों जान
कोई फर्क नहीं पड़ता उन्हें
होली हो, दिवाली हो या फ़िर रमजान।

दुस्साहस,
ईमेल से दे रहे चुनौती खुलेआम
दहशत में आदमी हर खास-ओ-आम
भूल जायें एन्जॉय करना अपनी सुबह-शाम
आज सड़क पर पालीथीन से ज्यादा नहीं जिंदगी के दाम
बंगलौर बीता, अहमदाबाद भुलाया
अब दिल्ली में शनिवार की शाम
देखते ही देखते पल भर में
कितनी जिंदगियों को किया तमाम।
दुर्भाग्य,
हम हैं खाली हाथ
करते बड़ी-बड़ी
विश्व में हम सबके साथ
पर, कोई नहीं हमारे साथ
जिन्होंने खोये अपने परिजन
कैसे कटती उनकी रात।
क्या कर रही सरकार,
जिसने ठानी हमसे रार
वो आतंक हो गया हम पर सवार
हम दे रहे उसे दुलार
सुरक्षित नहीं रहा घर-परिवार
सिमी हो या संघ परिवार
हमने दे दिए सबको
मनमर्जी के अधिकार
नहीं क्या सख्ती से पलटवार
तो, यही होता रहेगा बार-बार।

Saturday, September 6, 2008

प्यार का इज़हार

अपने सच्चे प्यार को हम किस तरह आवाज़ दें,
कहते हैं, शरमाते हैं, फ़िर किस तरह परवाज़ दें।

उनको इतना इल्म क्या, या यूँ कहें सऊर नहीं,
हमारी छोटी-छोटी हरकतों का कैसे वो जवाब दें,

मौत की ख़बर सुनाई सहेलियों ने जब उन्हें,
बोल उठीं तपाक से, जाकर सवाब दें।

उनके अंगदिपन से हम तो पसोपेश में,
लेमनजूस काफी है या फ़िर दो कबाब दें।

आंसुओं से धोयेंगे नाकामी की बदनामी को,
उनसे जाकर ये कहो, बड़े-बड़े रकाब दें।

Wednesday, August 6, 2008

तेरी याद खूब आई

बेखुदी है, बेरुखी या बेवफाई,
तेरी जानिब से मिले कुछ तो सफाई।

आज भी गुलशन है तेरा मुन्तजिर,
खुशबू तेरे प्यार की दिल में समाई।

राज दिल का हम से ही कुछ खोल दो,
कब तलक छुप-छुप के लोगे अंगड़ाई।

दर्द दिल का और भी बढ़ने लगा,
जब पवन चलने लगे पुरवाई।

कुर्ब तेरा था, गिले-शिकवे भी थे,
दूर जाकर तेरी याद खूब आई।

Tuesday, July 22, 2008

गाँधी तोरे देस में

आज २२ जुलाई २००८
दोपहर वक्त
गाँधी ने आँखे खोलीं
यह देखने को
कि जब से band हुई उनकी आँखें
शायद पहली बार संसद में दिखा
गहन चिंतन।
पर,
यह क्या?
संसद भवन की दीवारों पर
बिखरा है खून ही खून।
टूट गया उनका भ्रम
यह देखकर
खून नहीं शहीदों का
बल्कि यह तो है भरोसे का,
उम्मीदों का,
सहारे का,
सपनों का,
संदेशों का,
धीरे से बुदबुदाये गाँधी-
भावुक होने की जरुरत नहीं,
हिम्मत है तो खुद आओ आगे,
क्योंकि,
शहीद हो गए, जिन्हें आता था मर-मिटना देश के लिए।
अब जिनके हाथों में सौंपी बागडोर
उनके बस में नहीं
सपने दिखाने और लूटने से ज्यादा कुछ.
सो, जो था उनके बस में,
उसका भी आज कर दिया खून।
गुस्से में गांधी ने खोया आपा-
उठिए,
जागिये,
एक और गांधी पैदा कीजिये,
नहीं है कुछ ऐसा करना बस में
तो रहिये तैयार देखने को
संसद ही नहीं, अपने घर की दरों-दीवारों पर
भी खून ही खून।

Tuesday, July 8, 2008

एस्केलेटर

माँ जब व्यस्त थी काम में
दादी ने झुलाया झूलना।
नन्हीं गुड़िया ने रखा
दरवाजे से बाहर कदम
दादी की उंगली पकड़ कर।
कब आई उसे नींद
दादी की लोरी सुने बिन।
जाड़े की लंबी रातें और
दादी की नरम-नरम कहानियाँ।
छोटी-छोटी जिद और
दादी की अठन्नी के साथ प्यारी सी डांट।
एक दिन,
निकली घर से बाहर
देखी दुनिया
रंगीन, खुशनुमा।
बढ़ गई आगे....
आज पाँच साल की गुड़िया
अपना फर्ज निभा रही है,
माल में दादी को एस्केलेटर पर
चढ़ना सिखा रही है।
ना,
तीन पीढियों के बीच की दूरी मिटा रही है।

Friday, July 4, 2008

फ़ोन

चिट्ठी थी जो एक सहारा
छीन ली थी फ़ोन ने।
घर से निकलकर माँ से दूरी
और बढ़ा दी फ़ोन ने।

बातें सब होतीं, लेकिन
लगता कुछ रह गया,
अनकही सी एक कसक
दिल में बढ़ा दी फ़ोन ने।

माँ की बीमारी की सुन
तड़प उठा जब मेरा दिल
अब्बू के कुछ कहने से पहले
बात काट दी फ़ोन ने।

अबकी बार आऊंगा माँ
सच, ये मेरा वादा रहा,
जब-जब चलने को हुआ
टिकट रद करा दी फ़ोन ने।

उनके लिए जी रहा था
हर तरक्की उनके लिए,
माँ के शिकवे पर हमेशा
बात कह दी फोन ने।

एक दिन ऐसा भी आया
मैं ठगा सा रह गया,
माँ की मौत की ख़बर
चुपके से सुना दी फ़ोन ने।

Thursday, July 3, 2008

उनकी हस्ती क्या मिटेगी

उनकी हस्ती क्या मिटेगी, कभी किसी तूफ़ान से,
मुश्किलों में जो खड़े हैं, समुद्र में चट्टान से।

हर घड़ी, हर सोच अपनी, काम अपने काम से,
जीत गए जंग वो सिपाही, जो रहे अनजान से।

संकल्प की लाठी उठाओ, ऐसे साँपों के ख़िलाफ़,
लगते हैं जो देखने में, हर तरह इंसान से।

बाप की दौलत पे ऐश, करने को तो खूब कर,
पर तरसता जाएगा, अपनी एक पहचान से।

पीठ पीछे की बुराई, जान ले अच्छी नहीं,
लौट कर आया नहीं, कभी कोई शमशान से।

मंदिरों को फूंक दो, मस्जिदों को दो उजाड़,
आदमी का हो भला गर, ऐसे ही श्रमदान से।

Wednesday, July 2, 2008

परदेस में

अब्बू के सपनों की फसल लहलहाई परदेस में,
घर से दूर घर की एक छत बनाई परदेस में।

पैसा भी है, मस्ती भी है, काम से काम अघोषित शर्त,
भरी महफ़िल में खूब सताए तन्हाई परदेस में।

कब भेजोगे मानी आर्डर, पूछ रही कमरे की छत,
रिश्ते की एक डोर बची, वो टूट रही परदेस में।

पक्षी से पंखों की ख्वाहिश, नींद भी रास्ता भूल गई,
कोई खबर अपनी तरफ़ से, जब आई परदेस में।

जिन्दगी के साथ दौड़ में, क्या-क्या पीछे छूट गया,
बाप की आहें, माँ की ममता हार गई परदेस में।

सूनी पड़ी है खेत-क्यारी, बुला रहा आँगन का नीम,
रोना हँसना भूल गया, घर की याद आई परदेस में।

किश्तों में जिंदगी

बिला नागा हर महीने
चुका रहा हूँ मैं
टेलीफोन का बिल
अखबार का बिल
बिजली का बिल
सोसायटी का बिल
दूध और सब्जी-किराने वाले का बिल।
पूरी शिद्दत और हिम्मत के साथ
तमाम सपनों और उम्मीदों के साथ
बराबर
जमा कर रहा हूँ
बीमे की किस्त
मकान की किस्त
गाड़ी-स्कूटर की किस्त।
दियोंदी के भीतर से हर माह जा रही है
फ्रिज, गीज़र और टीवी की किस्त।
क्या यही है मेरे शहर का अंजाम
बिल और किस्तों में
हो जायेगी जिंदगी की शाम?

Tuesday, July 1, 2008

इश्क करना है तो कर

इश्क करना है तो कर, देखता रह जाएगा,
उम्र ढलती जायेगी, देखता रह जाएगा।

काली जुल्फें कल तलक, खो देंगी अपनी चमक,
किसकी कसमें खायेगा, देखता रह जाएगा।

सोचना बेकार, इश्क मानता है दिल की बात,
दिल धड़कना छोड़ देगा, देखता रह जाएगा।

आजमाना, तड़पाना, आंसू बहाना, ना-नुकुर,
ख़ूबसूरत शर्तें चार, देखता रह जाएगा।

जो मिले सुभान अल्लाह, हुस्न के चक्कर न काट,
हूर के नखरे हजार, देखता रह जाएगा।

तसलीम तो खाना-ख़राब, उसकी बात छोड़ दे,
बे-आवाज़ तेरा प्यार, देखता रह जाएगा।

Saturday, June 28, 2008

अन्तर

मेरे हक को करके गडमड
उन्होंने थोपना चाहा एहसान।
देना वे भी चाहते थे,
मांगता मैं भी था।
मैं हक से,
वे एहसान से।
इसी अन्तर ने बना दिया
एक न मिटने वाला अंतर
दोनों के बीच।
वे उस छोर
मैं इस ओर
न देख पाते एक-दूसरे को देख कर।
काश!
न होता एहसान उनके पास
न होती मुझे हक की तमीज
अन्तर तो बिल्कुल न होता
दोनों के आसपास।
क्योंकि
यही अन्तर है
रिश्तों की भीड़ में
सबसे खतरनाक।





Friday, June 27, 2008

एक-दूसरे में

जब से बंधे बंधन में
शादी के, जिन्दगी के
एक-दूसरे से।
गुथे एक-दूसरे में रस्सी से।
टूटे नहीं किसी अंधड़ तूफ़ान से
भुन गई आग भी,
तपिश के बीच मुस्कान से।
कभी-कभी जरूर
ऐठन होती महसूस
पानी में भीग कर
या
ज्यादा खींच कर।
जितना करते अलग होने की
कोशिश एक-दूसरे से,
सिमटते और शिद्दत से
एक-दूसरे में रस्सी से।

Thursday, June 26, 2008

बेजार चिड़िया

आंगन में ओंधे मुंह पड़ी लाचार
मुंडेर से लुढ़की बेजार चिड़िया.
मुंह में झाग, आँखों में बेचारगी
कांपते शरीर को थामने की कोशिश में चिड़िया।
मै दौड़ा, हथेली पे उठाया, सहलाया
मरणासन्न, पर उड़ने को बेकरार चिड़िया।
कटोरी में पानी, होंठो पर इल्तेजा
कुछ भी सुनने को नहीं तैयार चिड़िया।
डूबती ऑंखें, मौत से संघर्ष
फ़िर भी उड़ने की जिद पर सवार चिड़िया।
जतन किए हजार, सब गए बेकार
जिद की मैंने भी, तो रोई जार-जार
क्यों ....
आखिर क्यों?
तो हार गई चिड़िया-
मुझे पानी नहीं, पंख दे दो,
अहसान नहीं, खुला आकाश दे दो।
बाज के चंगुल से छूटकर
गिरी थी इसी तरह आंगन में
पानी पिलाया, सहलाया, मरहम लगाया
कुछ चंगी हुई तो छुरी ले आया।
भागी हूँ किसी तरह जान लेकर,
बाज सी आदमी की पहचान लेकर।


Tuesday, June 24, 2008

औरत ही क्यों शिकार

उन्होंने पूछा था एक बार
औरत ही क्यों होती है शिकार
पतित्व के सवालों का
घर के हवालों का
भीड़ के बवालों का
जवाब नही किसी के पास
छूटते बस्ते का
टूटते रिश्ते का
भयानक रस्ते का
सिल गए होंट
औरत की जात पर
शौहर की बात पर
डूबती रात पर
कैसी सहानुभूति
बराबर के हक़ में
चरित्र के शक में
बेटी के पक्ष में
हाँ,
उन्होंने पूछा था एक बार
औरत ही क्यों होती है शिकार?
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Sunday, June 22, 2008

कुछ तो है बारिश में

कुछ तो है बारिश में
बारिश की बूंदें छूकर
चरर-चरर करती धरती
अलसाई धरती
कुछ कहने को ललचाई धरती
कुछ सहने को कसमसाई धरती।
एक हलचल धरातल पर
फूटता बीज
दो पत्ते
पहले-पहल
अभी-अभी जन्मे शिशु की तरह।
नए-नए कपड़े पहन वृक्ष
बीज के पैदा होने की खुशी में।
नाचते मोर
गाती कोयल
कुलांचे भरता हिरन
खेतों की लंबाई सिमटी
पैरों के बीच।
झूमता साँपों का जोड़ा
बेखबर बच्चों के शोर से
कपड़े के टुकड़े से
लकडियों के ढेर से
दो दिल
दूर
इक-दूसरे से
या
पास, बहुत पास
खेत में
बेडरूम में।
प्यार चढ़ता परवान
याद आता बिछुड़ा मीत
तड़प उठता मन
मिलने को प्रियतम से।
सारी सुंदरता सिमट आती
औरत के बदन में,
उम्मीदें समेत लेता टूटता दिल।
कुछ तो है बारिश में-
करती आंदोलित
बदन और धरती को
मन और प्रकृति को
एक साथ।




Saturday, June 21, 2008

उस पंछी को शुभ प्रभात

पहले मेरे आंगन में गाए,
उस पंछी को शुभ प्रभात।
सुबह का पहला गीत सुनाये,
उस पंछी को शुभ प्रभात।
मीठी भाषा मुझे सिखाये,
उस पंछी को शुभ प्रभात।
मम्मी-पापा, गुड्डू-गुड़िया,
मेरे दोस्त राम-रहीम,
सबको मिल कर रहना सिखाये,
उस पंछी को शुभ प्रभात।
दूर देश में चुगने जाती,
शाम को अपने घर आ जाती,
हृदय में प्रेम का दीप जलाए,
उस पंछी को शुभ प्रभात।
शुभ प्रभात, शुभ प्रभात, शुभ प्रभात।
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Friday, June 20, 2008

roj ek din

chala hun is ummid ke sath ki milenge dost aur unki duayen raste bher.