उनकी हस्ती क्या मिटेगी, कभी किसी तूफ़ान से,
मुश्किलों में जो खड़े हैं, समुद्र में चट्टान से।
हर घड़ी, हर सोच अपनी, काम अपने काम से,
जीत गए जंग वो सिपाही, जो रहे अनजान से।
संकल्प की लाठी उठाओ, ऐसे साँपों के ख़िलाफ़,
लगते हैं जो देखने में, हर तरह इंसान से।
बाप की दौलत पे ऐश, करने को तो खूब कर,
पर तरसता जाएगा, अपनी एक पहचान से।
पीठ पीछे की बुराई, जान ले अच्छी नहीं,
लौट कर आया नहीं, कभी कोई शमशान से।
मंदिरों को फूंक दो, मस्जिदों को दो उजाड़,
आदमी का हो भला गर, ऐसे ही श्रमदान से।