मेरे हक को करके गडमड
उन्होंने थोपना चाहा एहसान।
देना वे भी चाहते थे,
मांगता मैं भी था।
मैं हक से,
वे एहसान से।
इसी अन्तर ने बना दिया
एक न मिटने वाला अंतर
दोनों के बीच।
वे उस छोर
मैं इस ओर
न देख पाते एक-दूसरे को देख कर।
काश!
न होता एहसान उनके पास
न होती मुझे हक की तमीज
अन्तर तो बिल्कुल न होता
दोनों के आसपास।
क्योंकि
यही अन्तर है
रिश्तों की भीड़ में
सबसे खतरनाक।
Saturday, June 28, 2008
Friday, June 27, 2008
एक-दूसरे में
जब से बंधे बंधन में
शादी के, जिन्दगी के
एक-दूसरे से।
गुथे एक-दूसरे में रस्सी से।
टूटे नहीं किसी अंधड़ तूफ़ान से
भुन गई आग भी,
तपिश के बीच मुस्कान से।
कभी-कभी जरूर
ऐठन होती महसूस
पानी में भीग कर
या
ज्यादा खींच कर।
जितना करते अलग होने की
कोशिश एक-दूसरे से,
सिमटते और शिद्दत से
एक-दूसरे में रस्सी से।
शादी के, जिन्दगी के
एक-दूसरे से।
गुथे एक-दूसरे में रस्सी से।
टूटे नहीं किसी अंधड़ तूफ़ान से
भुन गई आग भी,
तपिश के बीच मुस्कान से।
कभी-कभी जरूर
ऐठन होती महसूस
पानी में भीग कर
या
ज्यादा खींच कर।
जितना करते अलग होने की
कोशिश एक-दूसरे से,
सिमटते और शिद्दत से
एक-दूसरे में रस्सी से।
Thursday, June 26, 2008
बेजार चिड़िया
आंगन में ओंधे मुंह पड़ी लाचार
मुंडेर से लुढ़की बेजार चिड़िया.
मुंह में झाग, आँखों में बेचारगी
कांपते शरीर को थामने की कोशिश में चिड़िया।
मै दौड़ा, हथेली पे उठाया, सहलाया
मरणासन्न, पर उड़ने को बेकरार चिड़िया।
कटोरी में पानी, होंठो पर इल्तेजा
कुछ भी सुनने को नहीं तैयार चिड़िया।
डूबती ऑंखें, मौत से संघर्ष
फ़िर भी उड़ने की जिद पर सवार चिड़िया।
जतन किए हजार, सब गए बेकार
जिद की मैंने भी, तो रोई जार-जार
क्यों ....
आखिर क्यों?
तो हार गई चिड़िया-
मुझे पानी नहीं, पंख दे दो,
अहसान नहीं, खुला आकाश दे दो।
बाज के चंगुल से छूटकर
गिरी थी इसी तरह आंगन में
पानी पिलाया, सहलाया, मरहम लगाया
कुछ चंगी हुई तो छुरी ले आया।
भागी हूँ किसी तरह जान लेकर,
बाज सी आदमी की पहचान लेकर।
मुंडेर से लुढ़की बेजार चिड़िया.
मुंह में झाग, आँखों में बेचारगी
कांपते शरीर को थामने की कोशिश में चिड़िया।
मै दौड़ा, हथेली पे उठाया, सहलाया
मरणासन्न, पर उड़ने को बेकरार चिड़िया।
कटोरी में पानी, होंठो पर इल्तेजा
कुछ भी सुनने को नहीं तैयार चिड़िया।
डूबती ऑंखें, मौत से संघर्ष
फ़िर भी उड़ने की जिद पर सवार चिड़िया।
जतन किए हजार, सब गए बेकार
जिद की मैंने भी, तो रोई जार-जार
क्यों ....
आखिर क्यों?
तो हार गई चिड़िया-
मुझे पानी नहीं, पंख दे दो,
अहसान नहीं, खुला आकाश दे दो।
बाज के चंगुल से छूटकर
गिरी थी इसी तरह आंगन में
पानी पिलाया, सहलाया, मरहम लगाया
कुछ चंगी हुई तो छुरी ले आया।
भागी हूँ किसी तरह जान लेकर,
बाज सी आदमी की पहचान लेकर।
Tuesday, June 24, 2008
औरत ही क्यों शिकार
उन्होंने पूछा था एक बार
औरत ही क्यों होती है शिकार
पतित्व के सवालों का
घर के हवालों का
भीड़ के बवालों का
जवाब नही किसी के पास
छूटते बस्ते का
टूटते रिश्ते का
भयानक रस्ते का
सिल गए होंट
औरत की जात पर
शौहर की बात पर
डूबती रात पर
कैसी सहानुभूति
बराबर के हक़ में
चरित्र के शक में
बेटी के पक्ष में
हाँ,
उन्होंने पूछा था एक बार
औरत ही क्यों होती है शिकार?
___________________
औरत ही क्यों होती है शिकार
पतित्व के सवालों का
घर के हवालों का
भीड़ के बवालों का
जवाब नही किसी के पास
छूटते बस्ते का
टूटते रिश्ते का
भयानक रस्ते का
सिल गए होंट
औरत की जात पर
शौहर की बात पर
डूबती रात पर
कैसी सहानुभूति
बराबर के हक़ में
चरित्र के शक में
बेटी के पक्ष में
हाँ,
उन्होंने पूछा था एक बार
औरत ही क्यों होती है शिकार?
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Sunday, June 22, 2008
कुछ तो है बारिश में
कुछ तो है बारिश में
बारिश की बूंदें छूकर
चरर-चरर करती धरती
अलसाई धरती
कुछ कहने को ललचाई धरती
कुछ सहने को कसमसाई धरती।
एक हलचल धरातल पर
फूटता बीज
दो पत्ते
पहले-पहल
अभी-अभी जन्मे शिशु की तरह।
नए-नए कपड़े पहन वृक्ष
बीज के पैदा होने की खुशी में।
नाचते मोर
गाती कोयल
कुलांचे भरता हिरन
खेतों की लंबाई सिमटी
पैरों के बीच।
झूमता साँपों का जोड़ा
बेखबर बच्चों के शोर से
कपड़े के टुकड़े से
लकडियों के ढेर से।
दो दिल
दूर
इक-दूसरे से
या
पास, बहुत पास
खेत में
बेडरूम में।
प्यार चढ़ता परवान
याद आता बिछुड़ा मीत
तड़प उठता मन
मिलने को प्रियतम से।
सारी सुंदरता सिमट आती
औरत के बदन में,
उम्मीदें समेत लेता टूटता दिल।
कुछ तो है बारिश में-
करती आंदोलित
बदन और धरती को
मन और प्रकृति को
एक साथ।
बारिश की बूंदें छूकर
चरर-चरर करती धरती
अलसाई धरती
कुछ कहने को ललचाई धरती
कुछ सहने को कसमसाई धरती।
एक हलचल धरातल पर
फूटता बीज
दो पत्ते
पहले-पहल
अभी-अभी जन्मे शिशु की तरह।
नए-नए कपड़े पहन वृक्ष
बीज के पैदा होने की खुशी में।
नाचते मोर
गाती कोयल
कुलांचे भरता हिरन
खेतों की लंबाई सिमटी
पैरों के बीच।
झूमता साँपों का जोड़ा
बेखबर बच्चों के शोर से
कपड़े के टुकड़े से
लकडियों के ढेर से।
दो दिल
दूर
इक-दूसरे से
या
पास, बहुत पास
खेत में
बेडरूम में।
प्यार चढ़ता परवान
याद आता बिछुड़ा मीत
तड़प उठता मन
मिलने को प्रियतम से।
सारी सुंदरता सिमट आती
औरत के बदन में,
उम्मीदें समेत लेता टूटता दिल।
कुछ तो है बारिश में-
करती आंदोलित
बदन और धरती को
मन और प्रकृति को
एक साथ।
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