Saturday, May 9, 2009

पगली

हमेशा व्यस्त
किताबें पढ़ना
बटन टांकना
कुछ न होने पर
कूड़ा ही सकेरना
छोटी सी गलती पर
बच्चे की तरह डांटना
...
यह क्यों उसे खुशी देता था
मुझे नहीं मालूम
वह क्यों हर सितम पर भी
मुस्कुराती रही
मुझे नहीं मालूम
रोज रात को सोने से पहले
पूछती
मेरी इच्छा क्या है
उसके अरमानों के किवाड़
बंद क्यों हैं
मुझे नहीं मालूम।
बच्चों से बांटकर मत देख मुझे पगली
जब-जब की मैंने ताकीद
रोकर क्यों मुझ में सिमट जाती
हर बार
मुझे नहीं मालूम।
उसने जी जिंदगी अपनी संपूर्ण
मैं आज भी क्यों
खाली-खाली हूँ
मुझे नहीं मालूम।

तिल्ली

हवा में जलती तिल्ली की तरह है जिंदगी
यह उसने मुझसे तब कहा था
जब
झंझावात में घिरा
वह मुस्करा रहा था।
वाकई,
जीतने की चाहत ने एक युग
जिया था
और
उस आखिरी शाम
होंठों की मुस्कराहट
आंखों की चमक ने
जैसे
कड़े शब्दों में कहा था
जलने की जिद में सुलगती
भीगी लकड़ी की तरह भी है
जिंदगी।