अब्बू के सपनों की फसल लहलहाई परदेस में,
घर से दूर घर की एक छत बनाई परदेस में।
पैसा भी है, मस्ती भी है, काम से काम अघोषित शर्त,
भरी महफ़िल में खूब सताए तन्हाई परदेस में।
कब भेजोगे मानी आर्डर, पूछ रही कमरे की छत,
रिश्ते की एक डोर बची, वो टूट रही परदेस में।
पक्षी से पंखों की ख्वाहिश, नींद भी रास्ता भूल गई,
कोई खबर अपनी तरफ़ से, जब आई परदेस में।
जिन्दगी के साथ दौड़ में, क्या-क्या पीछे छूट गया,
बाप की आहें, माँ की ममता हार गई परदेस में।
सूनी पड़ी है खेत-क्यारी, बुला रहा आँगन का नीम,
रोना हँसना भूल गया, घर की याद आई परदेस में।
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Wednesday, July 2, 2008
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