Showing posts with label चिड़िया बेजार. Show all posts
Showing posts with label चिड़िया बेजार. Show all posts

Thursday, June 26, 2008

बेजार चिड़िया

आंगन में ओंधे मुंह पड़ी लाचार
मुंडेर से लुढ़की बेजार चिड़िया.
मुंह में झाग, आँखों में बेचारगी
कांपते शरीर को थामने की कोशिश में चिड़िया।
मै दौड़ा, हथेली पे उठाया, सहलाया
मरणासन्न, पर उड़ने को बेकरार चिड़िया।
कटोरी में पानी, होंठो पर इल्तेजा
कुछ भी सुनने को नहीं तैयार चिड़िया।
डूबती ऑंखें, मौत से संघर्ष
फ़िर भी उड़ने की जिद पर सवार चिड़िया।
जतन किए हजार, सब गए बेकार
जिद की मैंने भी, तो रोई जार-जार
क्यों ....
आखिर क्यों?
तो हार गई चिड़िया-
मुझे पानी नहीं, पंख दे दो,
अहसान नहीं, खुला आकाश दे दो।
बाज के चंगुल से छूटकर
गिरी थी इसी तरह आंगन में
पानी पिलाया, सहलाया, मरहम लगाया
कुछ चंगी हुई तो छुरी ले आया।
भागी हूँ किसी तरह जान लेकर,
बाज सी आदमी की पहचान लेकर।