कुछ तो है बारिश में
बारिश की बूंदें छूकर
चरर-चरर करती धरती
अलसाई धरती
कुछ कहने को ललचाई धरती
कुछ सहने को कसमसाई धरती।
एक हलचल धरातल पर
फूटता बीज
दो पत्ते
पहले-पहल
अभी-अभी जन्मे शिशु की तरह।
नए-नए कपड़े पहन वृक्ष
बीज के पैदा होने की खुशी में।
नाचते मोर
गाती कोयल
कुलांचे भरता हिरन
खेतों की लंबाई सिमटी
पैरों के बीच।
झूमता साँपों का जोड़ा
बेखबर बच्चों के शोर से
कपड़े के टुकड़े से
लकडियों के ढेर से।
दो दिल
दूर
इक-दूसरे से
या
पास, बहुत पास
खेत में
बेडरूम में।
प्यार चढ़ता परवान
याद आता बिछुड़ा मीत
तड़प उठता मन
मिलने को प्रियतम से।
सारी सुंदरता सिमट आती
औरत के बदन में,
उम्मीदें समेत लेता टूटता दिल।
कुछ तो है बारिश में-
करती आंदोलित
बदन और धरती को
मन और प्रकृति को
एक साथ।
Sunday, June 22, 2008
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