Friday, July 4, 2008

फ़ोन

चिट्ठी थी जो एक सहारा
छीन ली थी फ़ोन ने।
घर से निकलकर माँ से दूरी
और बढ़ा दी फ़ोन ने।

बातें सब होतीं, लेकिन
लगता कुछ रह गया,
अनकही सी एक कसक
दिल में बढ़ा दी फ़ोन ने।

माँ की बीमारी की सुन
तड़प उठा जब मेरा दिल
अब्बू के कुछ कहने से पहले
बात काट दी फ़ोन ने।

अबकी बार आऊंगा माँ
सच, ये मेरा वादा रहा,
जब-जब चलने को हुआ
टिकट रद करा दी फ़ोन ने।

उनके लिए जी रहा था
हर तरक्की उनके लिए,
माँ के शिकवे पर हमेशा
बात कह दी फोन ने।

एक दिन ऐसा भी आया
मैं ठगा सा रह गया,
माँ की मौत की ख़बर
चुपके से सुना दी फ़ोन ने।

Thursday, July 3, 2008

उनकी हस्ती क्या मिटेगी

उनकी हस्ती क्या मिटेगी, कभी किसी तूफ़ान से,
मुश्किलों में जो खड़े हैं, समुद्र में चट्टान से।

हर घड़ी, हर सोच अपनी, काम अपने काम से,
जीत गए जंग वो सिपाही, जो रहे अनजान से।

संकल्प की लाठी उठाओ, ऐसे साँपों के ख़िलाफ़,
लगते हैं जो देखने में, हर तरह इंसान से।

बाप की दौलत पे ऐश, करने को तो खूब कर,
पर तरसता जाएगा, अपनी एक पहचान से।

पीठ पीछे की बुराई, जान ले अच्छी नहीं,
लौट कर आया नहीं, कभी कोई शमशान से।

मंदिरों को फूंक दो, मस्जिदों को दो उजाड़,
आदमी का हो भला गर, ऐसे ही श्रमदान से।

Wednesday, July 2, 2008

परदेस में

अब्बू के सपनों की फसल लहलहाई परदेस में,
घर से दूर घर की एक छत बनाई परदेस में।

पैसा भी है, मस्ती भी है, काम से काम अघोषित शर्त,
भरी महफ़िल में खूब सताए तन्हाई परदेस में।

कब भेजोगे मानी आर्डर, पूछ रही कमरे की छत,
रिश्ते की एक डोर बची, वो टूट रही परदेस में।

पक्षी से पंखों की ख्वाहिश, नींद भी रास्ता भूल गई,
कोई खबर अपनी तरफ़ से, जब आई परदेस में।

जिन्दगी के साथ दौड़ में, क्या-क्या पीछे छूट गया,
बाप की आहें, माँ की ममता हार गई परदेस में।

सूनी पड़ी है खेत-क्यारी, बुला रहा आँगन का नीम,
रोना हँसना भूल गया, घर की याद आई परदेस में।

किश्तों में जिंदगी

बिला नागा हर महीने
चुका रहा हूँ मैं
टेलीफोन का बिल
अखबार का बिल
बिजली का बिल
सोसायटी का बिल
दूध और सब्जी-किराने वाले का बिल।
पूरी शिद्दत और हिम्मत के साथ
तमाम सपनों और उम्मीदों के साथ
बराबर
जमा कर रहा हूँ
बीमे की किस्त
मकान की किस्त
गाड़ी-स्कूटर की किस्त।
दियोंदी के भीतर से हर माह जा रही है
फ्रिज, गीज़र और टीवी की किस्त।
क्या यही है मेरे शहर का अंजाम
बिल और किस्तों में
हो जायेगी जिंदगी की शाम?

Tuesday, July 1, 2008

इश्क करना है तो कर

इश्क करना है तो कर, देखता रह जाएगा,
उम्र ढलती जायेगी, देखता रह जाएगा।

काली जुल्फें कल तलक, खो देंगी अपनी चमक,
किसकी कसमें खायेगा, देखता रह जाएगा।

सोचना बेकार, इश्क मानता है दिल की बात,
दिल धड़कना छोड़ देगा, देखता रह जाएगा।

आजमाना, तड़पाना, आंसू बहाना, ना-नुकुर,
ख़ूबसूरत शर्तें चार, देखता रह जाएगा।

जो मिले सुभान अल्लाह, हुस्न के चक्कर न काट,
हूर के नखरे हजार, देखता रह जाएगा।

तसलीम तो खाना-ख़राब, उसकी बात छोड़ दे,
बे-आवाज़ तेरा प्यार, देखता रह जाएगा।