Wednesday, July 2, 2008

किश्तों में जिंदगी

बिला नागा हर महीने
चुका रहा हूँ मैं
टेलीफोन का बिल
अखबार का बिल
बिजली का बिल
सोसायटी का बिल
दूध और सब्जी-किराने वाले का बिल।
पूरी शिद्दत और हिम्मत के साथ
तमाम सपनों और उम्मीदों के साथ
बराबर
जमा कर रहा हूँ
बीमे की किस्त
मकान की किस्त
गाड़ी-स्कूटर की किस्त।
दियोंदी के भीतर से हर माह जा रही है
फ्रिज, गीज़र और टीवी की किस्त।
क्या यही है मेरे शहर का अंजाम
बिल और किस्तों में
हो जायेगी जिंदगी की शाम?