Friday, October 10, 2008

न...न... रोना न

न... न...रोना न
जीवन अपना खोना न
आंसू बूंद संभाल जरा
इतना अच्छा सोना न।

बेसबब बातों से बच
निकाल जुबां से हरदम सच
मत अपना ही रख कायम
बोझ किसी का ढोना न।

जीना हंसकर रोज, हर पल
लौट के आया है कब कल
एक पहचान बनाकर चल
भीड़ में चलकर खोना न।

रिश्तों से रिश्ते जुड़ जाते
फूलों पर ही भंवरे आते
दोस्त बड़ी पूंजी हैं दोस्त
बीज ईर्ष्या के बोना न।

करने से कुछ भी हो जाता
रीते मन अपना भी जाता
खून-पसीना रंग पहचान
काम में जादू टोना न।

2 comments:

फ़िरदौस ख़ान said...

जीना हंसकर रोज, हर पल
लौट के आया है कब कल
एक पहचान बनाकर चल
भीड़ में चलकर खोना न।

बहुत ख़ूब...अपने ब्लॉग में आपके ब्लॉग का लिंक दे रही हूं...

परमजीत सिहँ बाली said...

तसलीम जी,बहुत सुन्दर रचना है।पढकर आनंद आ गया।आभार।

जीना हंसकर रोज, हर पल
लौट के आया है कब कल
एक पहचान बनाकर चल
भीड़ में चलकर खोना न।