Tuesday, July 8, 2008

एस्केलेटर

माँ जब व्यस्त थी काम में
दादी ने झुलाया झूलना।
नन्हीं गुड़िया ने रखा
दरवाजे से बाहर कदम
दादी की उंगली पकड़ कर।
कब आई उसे नींद
दादी की लोरी सुने बिन।
जाड़े की लंबी रातें और
दादी की नरम-नरम कहानियाँ।
छोटी-छोटी जिद और
दादी की अठन्नी के साथ प्यारी सी डांट।
एक दिन,
निकली घर से बाहर
देखी दुनिया
रंगीन, खुशनुमा।
बढ़ गई आगे....
आज पाँच साल की गुड़िया
अपना फर्ज निभा रही है,
माल में दादी को एस्केलेटर पर
चढ़ना सिखा रही है।
ना,
तीन पीढियों के बीच की दूरी मिटा रही है।

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