चिट्ठी थी जो एक सहारा
छीन ली थी फ़ोन ने।
घर से निकलकर माँ से दूरी
और बढ़ा दी फ़ोन ने।
बातें सब होतीं, लेकिन
लगता कुछ रह गया,
अनकही सी एक कसक
दिल में बढ़ा दी फ़ोन ने।
माँ की बीमारी की सुन
तड़प उठा जब मेरा दिल
अब्बू के कुछ कहने से पहले
बात काट दी फ़ोन ने।
अबकी बार आऊंगा माँ
सच, ये मेरा वादा रहा,
जब-जब चलने को हुआ
टिकट रद करा दी फ़ोन ने।
उनके लिए जी रहा था
हर तरक्की उनके लिए,
माँ के शिकवे पर हमेशा
बात कह दी फोन ने।
एक दिन ऐसा भी आया
मैं ठगा सा रह गया,
माँ की मौत की ख़बर
चुपके से सुना दी फ़ोन ने।
Friday, July 4, 2008
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4 comments:
sachhi bat bandhu.....
bilkul sahi likha hai. jo bate hum letter me likh sakte hai vo kahe nahi sakte.
dr. anurag ji aur rashmi ji aap logon ka bahoot-bahoot dhanyawad.
badhai...bahut sachi hakikat kahi hai aapne....badhai ke patra to aap hai.
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