Tuesday, June 24, 2008

औरत ही क्यों शिकार

उन्होंने पूछा था एक बार
औरत ही क्यों होती है शिकार
पतित्व के सवालों का
घर के हवालों का
भीड़ के बवालों का
जवाब नही किसी के पास
छूटते बस्ते का
टूटते रिश्ते का
भयानक रस्ते का
सिल गए होंट
औरत की जात पर
शौहर की बात पर
डूबती रात पर
कैसी सहानुभूति
बराबर के हक़ में
चरित्र के शक में
बेटी के पक्ष में
हाँ,
उन्होंने पूछा था एक बार
औरत ही क्यों होती है शिकार?
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Sunday, June 22, 2008

कुछ तो है बारिश में

कुछ तो है बारिश में
बारिश की बूंदें छूकर
चरर-चरर करती धरती
अलसाई धरती
कुछ कहने को ललचाई धरती
कुछ सहने को कसमसाई धरती।
एक हलचल धरातल पर
फूटता बीज
दो पत्ते
पहले-पहल
अभी-अभी जन्मे शिशु की तरह।
नए-नए कपड़े पहन वृक्ष
बीज के पैदा होने की खुशी में।
नाचते मोर
गाती कोयल
कुलांचे भरता हिरन
खेतों की लंबाई सिमटी
पैरों के बीच।
झूमता साँपों का जोड़ा
बेखबर बच्चों के शोर से
कपड़े के टुकड़े से
लकडियों के ढेर से
दो दिल
दूर
इक-दूसरे से
या
पास, बहुत पास
खेत में
बेडरूम में।
प्यार चढ़ता परवान
याद आता बिछुड़ा मीत
तड़प उठता मन
मिलने को प्रियतम से।
सारी सुंदरता सिमट आती
औरत के बदन में,
उम्मीदें समेत लेता टूटता दिल।
कुछ तो है बारिश में-
करती आंदोलित
बदन और धरती को
मन और प्रकृति को
एक साथ।