Tuesday, July 22, 2008

गाँधी तोरे देस में

आज २२ जुलाई २००८
दोपहर वक्त
गाँधी ने आँखे खोलीं
यह देखने को
कि जब से band हुई उनकी आँखें
शायद पहली बार संसद में दिखा
गहन चिंतन।
पर,
यह क्या?
संसद भवन की दीवारों पर
बिखरा है खून ही खून।
टूट गया उनका भ्रम
यह देखकर
खून नहीं शहीदों का
बल्कि यह तो है भरोसे का,
उम्मीदों का,
सहारे का,
सपनों का,
संदेशों का,
धीरे से बुदबुदाये गाँधी-
भावुक होने की जरुरत नहीं,
हिम्मत है तो खुद आओ आगे,
क्योंकि,
शहीद हो गए, जिन्हें आता था मर-मिटना देश के लिए।
अब जिनके हाथों में सौंपी बागडोर
उनके बस में नहीं
सपने दिखाने और लूटने से ज्यादा कुछ.
सो, जो था उनके बस में,
उसका भी आज कर दिया खून।
गुस्से में गांधी ने खोया आपा-
उठिए,
जागिये,
एक और गांधी पैदा कीजिये,
नहीं है कुछ ऐसा करना बस में
तो रहिये तैयार देखने को
संसद ही नहीं, अपने घर की दरों-दीवारों पर
भी खून ही खून।

1 comment:

شہروز said...

bhai tasleem arz hai aur ham tasleem karte hain aapki kavish aur koshish bhi jo beintaha kamyaab hai.