अपने सच्चे प्यार को हम किस तरह आवाज़ दें,
कहते हैं, शरमाते हैं, फ़िर किस तरह परवाज़ दें।
उनको इतना इल्म क्या, या यूँ कहें सऊर नहीं,
हमारी छोटी-छोटी हरकतों का कैसे वो जवाब दें,
मौत की ख़बर सुनाई सहेलियों ने जब उन्हें,
बोल उठीं तपाक से, जाकर सवाब दें।
उनके अंगदिपन से हम तो पसोपेश में,
लेमनजूस काफी है या फ़िर दो कबाब दें।
आंसुओं से धोयेंगे नाकामी की बदनामी को,
उनसे जाकर ये कहो, बड़े-बड़े रकाब दें।
Saturday, September 6, 2008
Wednesday, August 6, 2008
तेरी याद खूब आई
बेखुदी है, बेरुखी या बेवफाई,
तेरी जानिब से मिले कुछ तो सफाई।
आज भी गुलशन है तेरा मुन्तजिर,
खुशबू तेरे प्यार की दिल में समाई।
राज दिल का हम से ही कुछ खोल दो,
कब तलक छुप-छुप के लोगे अंगड़ाई।
दर्द दिल का और भी बढ़ने लगा,
जब पवन चलने लगे पुरवाई।
कुर्ब तेरा था, गिले-शिकवे भी थे,
दूर जाकर तेरी याद खूब आई।
तेरी जानिब से मिले कुछ तो सफाई।
आज भी गुलशन है तेरा मुन्तजिर,
खुशबू तेरे प्यार की दिल में समाई।
राज दिल का हम से ही कुछ खोल दो,
कब तलक छुप-छुप के लोगे अंगड़ाई।
दर्द दिल का और भी बढ़ने लगा,
जब पवन चलने लगे पुरवाई।
कुर्ब तेरा था, गिले-शिकवे भी थे,
दूर जाकर तेरी याद खूब आई।
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