Tuesday, July 8, 2008

एस्केलेटर

माँ जब व्यस्त थी काम में
दादी ने झुलाया झूलना।
नन्हीं गुड़िया ने रखा
दरवाजे से बाहर कदम
दादी की उंगली पकड़ कर।
कब आई उसे नींद
दादी की लोरी सुने बिन।
जाड़े की लंबी रातें और
दादी की नरम-नरम कहानियाँ।
छोटी-छोटी जिद और
दादी की अठन्नी के साथ प्यारी सी डांट।
एक दिन,
निकली घर से बाहर
देखी दुनिया
रंगीन, खुशनुमा।
बढ़ गई आगे....
आज पाँच साल की गुड़िया
अपना फर्ज निभा रही है,
माल में दादी को एस्केलेटर पर
चढ़ना सिखा रही है।
ना,
तीन पीढियों के बीच की दूरी मिटा रही है।

Friday, July 4, 2008

फ़ोन

चिट्ठी थी जो एक सहारा
छीन ली थी फ़ोन ने।
घर से निकलकर माँ से दूरी
और बढ़ा दी फ़ोन ने।

बातें सब होतीं, लेकिन
लगता कुछ रह गया,
अनकही सी एक कसक
दिल में बढ़ा दी फ़ोन ने।

माँ की बीमारी की सुन
तड़प उठा जब मेरा दिल
अब्बू के कुछ कहने से पहले
बात काट दी फ़ोन ने।

अबकी बार आऊंगा माँ
सच, ये मेरा वादा रहा,
जब-जब चलने को हुआ
टिकट रद करा दी फ़ोन ने।

उनके लिए जी रहा था
हर तरक्की उनके लिए,
माँ के शिकवे पर हमेशा
बात कह दी फोन ने।

एक दिन ऐसा भी आया
मैं ठगा सा रह गया,
माँ की मौत की ख़बर
चुपके से सुना दी फ़ोन ने।