Sunday, November 2, 2008

जब-जब कहा गया उनसे

जब-जब कहा गया उनसे-
ठीक नहीं भाई बिन सोचे-समझे
खेती को खाते जाना
शहरी अन्धानुकरण में
कंक्रीट के जंगल बढाते जाना
सीढीयों को तरसती सीढीनुमा इमारतें
खड़ी करते जाना
नकली घास और पोधों से
प्रकृति का श्रंगार करते जाना
उनकी कड़ी प्रतिक्रिया-
तुम विकास विरोधी हो!

जब-जब कहा गया उनसे-
फैशन के नाम पर जिस्म की नुमाइश ठीक नहीं
स्त्री विमर्श के नाम पर नारी को कमतरी का
अहसास दिलाना बड़ा गुनाह है
आधुनिक होने का झांसा दे
उसके तन, मन और विचारों से खेलना
सीधी-सीधी ठगी है
तो पता है क्या बोले?
तुम स्त्री गुलामी के प्रतीक हो!

जब-जब कहा गया उनसे-
भाई, सेक्स पढाने की चीज़ नहीं
मन्दिर-मस्जिद लड़ने की जगह नहीं
संसद कोई अखाडा नहीं
जनता का पैसा निजी खजाना नहीं
उनकी एक सुर में दहाड़-
तुम लोकतंत्र के दुश्मन!

जब-जब कहा गया उनसे-
सच छुपाने की चीज़ नहीं
जमाना होशियार
पैसे वाले कंगाल कहलाओगे
विकल्प हज़ार
तुम माँ, बेटी, बहन और बीवी को
तरस जाओगे
हमें है ख़ुद से प्यार
तुम पुनः गुलाम बन जाओगे
उनकी पूरी बेशर्मी से हुंकार-
हम हैं तैयार!


Friday, October 31, 2008

टुकड़ों में घरोंदा बंटता जाएगा

हौसला आतंकियों का बढ़ता जाएगा
कारवां बीच रस्ते लुटता जाएगा।

सींचा था जिसको लहू से अपने
अब वो चमन उजड़ता जाएगा।

आँख अपनी खोल लो देशवासियों,
टुकड़ों में घरोंदा बंटता जाएगा।

अपने ही हुए हैं प्यासे खून के,
तसलीम किसको दोष देता जाएगा।