Friday, October 10, 2008

न...न... रोना न

न... न...रोना न
जीवन अपना खोना न
आंसू बूंद संभाल जरा
इतना अच्छा सोना न।

बेसबब बातों से बच
निकाल जुबां से हरदम सच
मत अपना ही रख कायम
बोझ किसी का ढोना न।

जीना हंसकर रोज, हर पल
लौट के आया है कब कल
एक पहचान बनाकर चल
भीड़ में चलकर खोना न।

रिश्तों से रिश्ते जुड़ जाते
फूलों पर ही भंवरे आते
दोस्त बड़ी पूंजी हैं दोस्त
बीज ईर्ष्या के बोना न।

करने से कुछ भी हो जाता
रीते मन अपना भी जाता
खून-पसीना रंग पहचान
काम में जादू टोना न।

Wednesday, October 8, 2008

बावली

यह तो बावली है
हाँ, यह तो बावली है
औरत है यह?
ना,
यह तो मेरे शरीर का कोई अंग
ना,
यह तो लोहे को लगा जंग
लड़ना खूब जानती है
रोना खूब जानती है
मनाता हूँ तो
मानना खूब जानती है
कहूँ इसको चतुर-चालाक
ना, साया खूब मांगती है
लगता, अब झगडा ख़त्म
आज के बाद सुखी हम
सारी स्त्री दुनिया से दूर
पुरूष वर्चस्व से दूर
खुशहाल होंगे हम
पर ना,
मैं कम क्यों चाहता हूँ उसे ?
बस, इसी बात पर बवाल
क्यों समझाते हो मुझे?
मैं क्यों नहीं समझा सकती तुम्हें?
हर बात पर यही सवाल
बचपन में माँ
बड़े होने पर बहन
बुढापे में बीवी
और
कमजोर होती सांसों में बेटी
हर बार, हर मोड़ पर
गलती पर भी
मेरा कवच बनने को तावली है
यह तो बावली है
हाँ, यह तो बावली है।