बेखुदी है, बेरुखी या बेवफाई,
तेरी जानिब से मिले कुछ तो सफाई।
आज भी गुलशन है तेरा मुन्तजिर,
खुशबू तेरे प्यार की दिल में समाई।
राज दिल का हम से ही कुछ खोल दो,
कब तलक छुप-छुप के लोगे अंगड़ाई।
दर्द दिल का और भी बढ़ने लगा,
जब पवन चलने लगे पुरवाई।
कुर्ब तेरा था, गिले-शिकवे भी थे,
दूर जाकर तेरी याद खूब आई।
Wednesday, August 6, 2008
Tuesday, July 22, 2008
गाँधी तोरे देस में
आज २२ जुलाई २००८
दोपहर वक्त
गाँधी ने आँखे खोलीं
यह देखने को
कि जब से band हुई उनकी आँखें
शायद पहली बार संसद में दिखा
गहन चिंतन।
पर,
यह क्या?
संसद भवन की दीवारों पर
बिखरा है खून ही खून।
टूट गया उनका भ्रम
यह देखकर
खून नहीं शहीदों का
बल्कि यह तो है भरोसे का,
उम्मीदों का,
सहारे का,
सपनों का,
संदेशों का,
धीरे से बुदबुदाये गाँधी-
भावुक होने की जरुरत नहीं,
हिम्मत है तो खुद आओ आगे,
क्योंकि,
शहीद हो गए, जिन्हें आता था मर-मिटना देश के लिए।
अब जिनके हाथों में सौंपी बागडोर
उनके बस में नहीं
सपने दिखाने और लूटने से ज्यादा कुछ.
सो, जो था उनके बस में,
उसका भी आज कर दिया खून।
गुस्से में गांधी ने खोया आपा-
उठिए,
जागिये,
एक और गांधी पैदा कीजिये,
नहीं है कुछ ऐसा करना बस में
तो रहिये तैयार देखने को
संसद ही नहीं, अपने घर की दरों-दीवारों पर
भी खून ही खून।
दोपहर वक्त
गाँधी ने आँखे खोलीं
यह देखने को
कि जब से band हुई उनकी आँखें
शायद पहली बार संसद में दिखा
गहन चिंतन।
पर,
यह क्या?
संसद भवन की दीवारों पर
बिखरा है खून ही खून।
टूट गया उनका भ्रम
यह देखकर
खून नहीं शहीदों का
बल्कि यह तो है भरोसे का,
उम्मीदों का,
सहारे का,
सपनों का,
संदेशों का,
धीरे से बुदबुदाये गाँधी-
भावुक होने की जरुरत नहीं,
हिम्मत है तो खुद आओ आगे,
क्योंकि,
शहीद हो गए, जिन्हें आता था मर-मिटना देश के लिए।
अब जिनके हाथों में सौंपी बागडोर
उनके बस में नहीं
सपने दिखाने और लूटने से ज्यादा कुछ.
सो, जो था उनके बस में,
उसका भी आज कर दिया खून।
गुस्से में गांधी ने खोया आपा-
उठिए,
जागिये,
एक और गांधी पैदा कीजिये,
नहीं है कुछ ऐसा करना बस में
तो रहिये तैयार देखने को
संसद ही नहीं, अपने घर की दरों-दीवारों पर
भी खून ही खून।
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