आतंक,
बुराई के इरादे हैं मजबूत
उनके निशाने हैं अचूक
उनके हाथ में नहीं बन्दूक
बाज़ार में ग्राहक से ज्यादा नहीं पहचान
पल भर में उनके खाते में दर्जनों जान
कोई फर्क नहीं पड़ता उन्हें
होली हो, दिवाली हो या फ़िर रमजान।
दुस्साहस,
ईमेल से दे रहे चुनौती खुलेआम
दहशत में आदमी हर खास-ओ-आम
भूल जायें एन्जॉय करना अपनी सुबह-शाम
आज सड़क पर पालीथीन से ज्यादा नहीं जिंदगी के दाम
बंगलौर बीता, अहमदाबाद भुलाया
अब दिल्ली में शनिवार की शाम
देखते ही देखते पल भर में
कितनी जिंदगियों को किया तमाम।
दुर्भाग्य,
हम हैं खाली हाथ
करते बड़ी-बड़ी
विश्व में हम सबके साथ
पर, कोई नहीं हमारे साथ
जिन्होंने खोये अपने परिजन
कैसे कटती उनकी रात।
क्या कर रही सरकार,
जिसने ठानी हमसे रार
वो आतंक हो गया हम पर सवार
हम दे रहे उसे दुलार
सुरक्षित नहीं रहा घर-परिवार
सिमी हो या संघ परिवार
हमने दे दिए सबको
मनमर्जी के अधिकार
नहीं क्या सख्ती से पलटवार
तो, यही होता रहेगा बार-बार।
Sunday, September 14, 2008
Saturday, September 6, 2008
प्यार का इज़हार
अपने सच्चे प्यार को हम किस तरह आवाज़ दें,
कहते हैं, शरमाते हैं, फ़िर किस तरह परवाज़ दें।
उनको इतना इल्म क्या, या यूँ कहें सऊर नहीं,
हमारी छोटी-छोटी हरकतों का कैसे वो जवाब दें,
मौत की ख़बर सुनाई सहेलियों ने जब उन्हें,
बोल उठीं तपाक से, जाकर सवाब दें।
उनके अंगदिपन से हम तो पसोपेश में,
लेमनजूस काफी है या फ़िर दो कबाब दें।
आंसुओं से धोयेंगे नाकामी की बदनामी को,
उनसे जाकर ये कहो, बड़े-बड़े रकाब दें।
कहते हैं, शरमाते हैं, फ़िर किस तरह परवाज़ दें।
उनको इतना इल्म क्या, या यूँ कहें सऊर नहीं,
हमारी छोटी-छोटी हरकतों का कैसे वो जवाब दें,
मौत की ख़बर सुनाई सहेलियों ने जब उन्हें,
बोल उठीं तपाक से, जाकर सवाब दें।
उनके अंगदिपन से हम तो पसोपेश में,
लेमनजूस काफी है या फ़िर दो कबाब दें।
आंसुओं से धोयेंगे नाकामी की बदनामी को,
उनसे जाकर ये कहो, बड़े-बड़े रकाब दें।
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