Saturday, June 28, 2008

अन्तर

मेरे हक को करके गडमड
उन्होंने थोपना चाहा एहसान।
देना वे भी चाहते थे,
मांगता मैं भी था।
मैं हक से,
वे एहसान से।
इसी अन्तर ने बना दिया
एक न मिटने वाला अंतर
दोनों के बीच।
वे उस छोर
मैं इस ओर
न देख पाते एक-दूसरे को देख कर।
काश!
न होता एहसान उनके पास
न होती मुझे हक की तमीज
अन्तर तो बिल्कुल न होता
दोनों के आसपास।
क्योंकि
यही अन्तर है
रिश्तों की भीड़ में
सबसे खतरनाक।





Friday, June 27, 2008

एक-दूसरे में

जब से बंधे बंधन में
शादी के, जिन्दगी के
एक-दूसरे से।
गुथे एक-दूसरे में रस्सी से।
टूटे नहीं किसी अंधड़ तूफ़ान से
भुन गई आग भी,
तपिश के बीच मुस्कान से।
कभी-कभी जरूर
ऐठन होती महसूस
पानी में भीग कर
या
ज्यादा खींच कर।
जितना करते अलग होने की
कोशिश एक-दूसरे से,
सिमटते और शिद्दत से
एक-दूसरे में रस्सी से।