Saturday, May 9, 2009

तिल्ली

हवा में जलती तिल्ली की तरह है जिंदगी
यह उसने मुझसे तब कहा था
जब
झंझावात में घिरा
वह मुस्करा रहा था।
वाकई,
जीतने की चाहत ने एक युग
जिया था
और
उस आखिरी शाम
होंठों की मुस्कराहट
आंखों की चमक ने
जैसे
कड़े शब्दों में कहा था
जलने की जिद में सुलगती
भीगी लकड़ी की तरह भी है
जिंदगी।

Sunday, November 9, 2008

अश्क

खामोश, पर ना
जिन्दा, पर ना
खुशी, पर ना
गम, पर ना
हाँ, पर ना
ना, पर ना
वाह! पर ना
आह! पर ना
जिद, पर ना
सहमति, पर ना
फ़िर, पर ना
अब, पर ना...

हाँ,
जुबां दिल की
हर हरक़त पर
हर आँख में
नूर हो या बेनूर
किसी से नहीं दूर।